Inter Board Exam Class 12th Geography ( दीर्घ उत्तरीय प्रश्न उत्तर ) 2024 ( 15 Marks ) | PART – 2

दोस्तों अगर आप बिहार बोर्ड के छात्र हैं। और कक्षा 12वीं की तैयारी कर रहे हैं। तथा अभी तक आप कक्षा 12 भूगोल का दीर्घ उत्तरीय प्रश्न उत्तर को नहीं पढ़े हैं। Class 12th Geography ( दीर्घ उत्तरीय प्रश्न उत्तर ) 2024 | PART – 2 तो इस पोस्ट में कक्षा 12 भूगोल का दीर्घ उत्तरीय प्रश्न उत्तर दिया गया है। class 12 geography question answer in hindi जो आपके परीक्षा के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है। यह सभी प्रश्न आपके इंटर बोर्ड परीक्षा में पूछे जा चुके हैं इसलिए इस प्रश्न को शुरू से अंत तक जरूर पढ़ें।

NOTE……..

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बिहार बोर्ड कक्षा 12 भूगोल का दीर्घ उत्तरीय प्रश्न उत्तर 2024

Q11. भारत में लौह अयस्क के वितरण का विवरण दीजिए। [2018A]

उत्तर लौह-इस्पात उद्योग आधारभूत उद्योग है। इससे विभिन्न कल-कारखानों के लिए मशीन तथा संयंत्र, कृषि के उपकरण तथा परिवहन के साधन बनाए जाते हैं। वास्तव में यह उद्योग आधुनिक सभ्यता की रीढ़ है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद लोहा-इस्पात उद्योग का विकास तेजी से हुआ। भिलाई (छत्तीसगढ़), राउरकेला (उड़ीसा) और दुर्गापुर (पश्चिम बंगाल) के अतिरिक्त बोकारो (झारखंड), सलेम (तमिलनाडु), विशाखापटनम (आंध्र प्रदेश) और विजयनगर (कर्नाटक) में कारखाने खोले गए। ये सभी कारखाने सार्वजनिक क्षेत्र में स्थापित किए गए हैं तथा “स्टील ऑथरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (SAIL) के नियंत्रण में है, जिसे 1974 ई० में कायम किया गया।

वितरण :- भारत में लोहा-इस्पात उद्योग का वितरण इस प्रकार है

(i) टाटा आयरन एण्ड स्टील कंपनी (TISCO) ⇒ यह मुम्बई-कोलकाता रेलमार्ग पर स्थित है। यहाँ के इस्पात के निर्यात के लिए सबसे नजदीक (लगभग 240 किमी० दूर) पत्तन कोलकाता है। संयंत्र को पानी स्वर्ण रेखा और खरकई नदियों से, लोहा नोआमुंडी और बादाम पहाड़ से, कोयला झरिया और रानीगंज से तथा जलविद्युत दामोदर घाटी से मिलती है।
(ii) इंडियन आयरन एण्ड स्टील कंपनी (IISCO) ⇒ इसकी तीन इकाइयाँ कुल्टी, हीरापुर और बर्नपुर में स्थित है। ये तीनों संयंत्र दामोदर घाटी कोयला क्षेत्रों के निकट कोलकाता-आसनसोल. रेलमार्ग पर स्थित है। इसे लौह-अयस्क सिंहभूम से, जल बराकर नदी से, चूना-पत्थर पलामू से तथा मैंगनीज मध्यप्रदेश से प्राप्त होता है। यह संयंत्र सरकार द्वारा अधिग्रहित कर लिया गया है।
(iii) विश्वेश्वरैया आयरन एण्ड स्टील लिमिटेड (VISL) ⇒ यह कारखाना 1923 ई० में कर्नाटक के भद्रावती नामक स्थान पर स्थापित किया गया। पहले इसे मैसूर आयरन एण्ड स्टील कंपनी (MISCO) कहा जाता था। यह सार्वजनिक क्षेत्र में है। इसे बाबाबूदन की पहाड़िया स लौह-अयस्क, निकटवर्ती क्षेत्रों से चूना पत्थर और मैंगनीज, जंगलों से काष्ठ कोयला तथा जोग और शिवसमुद्रम प्रपात से जल विद्युत मिलती है। यहाँ स्टेनलेस स्टील तथा दैनिक साज-सामा के लिए विशेष प्रकार का इस्पात तैयार किया जाता है। .

 

(iv) राउरकेला इस्पात संयंत्र ⇒ यह कारखाना 1954 ई० में जर्मनी की सहायता से उड़ीसा के राउरकेला स्थान पर स्थापित किया गया। अन्य सुविधाओं के अतिरिक्त इसे कोइल और शंख नदियों से जल तथा हीराकुंड परियोजना से जलविद्युत मिलती है। :
(v) भिलाई इस्पात संयंत्र इसकी स्थापना 1955 में रूस की सहायता से छत्तीसगढ़ के भिलाई नामक स्थान पर हुई।
(vi) दुर्गापुर इस्पात संयंत्र यह कारखाना ग्रेट ब्रिटेन की सहायता से कोलकाता के निकट दुर्गापुर में 1956 ई० में स्थापित किया गया।
(vii) बोकारो इस्पात संयंत्र ⇒ यह इस्पात संयंत्र रूस के सहयोग से 1964 में दामोदर नदी किनारे झारखंड के बोकारो नामक स्थान पर स्थापित किया गया। यह भारत का सबसे बड़ा संयंत्र है।

(viii)सलेम स्टील प्लांट इसकी स्थापना तमिलनाडु के सलेम नामक स्थान पर की गई। इसे 1982 में पूरा किया गया।
(ix) विशाखापटनम (विजाग) स्टील संयंत्र यह आंध्र प्रदेश के विशाखापट्नम बंदरगाह पर 1989 ई० में स्थापित किया गया। यह भारत का पहला पत्तन आधारित संयंत्र है, जिसे निर्यात की सुविधा प्राप्त है।
(x) विजयनगर स्टील संयंत्र यह कर्नाटक के हॉस्पेट में स्थित है। इन मुख्य इस्पात संयंत्रों के अतिरिक्त भारत में 200 से अधिक छोटे इस्पात संयंत्र हैं, जो स्क्रैप (टूटे-फूटे रद्दी स्टील) और स्पंज लोहे का उपयोग कच्चा माल के रूप में करते हैं। भारत स्पंज स्क्रैप लोहा का विश्व में सबसे बड़ा उत्पादक है।


Q12. भारत में लौह एवं इस्पात उद्योग के विकास का वर्णन करें।

उत्तर भारत में हजारों वर्ष पूर्व उत्तम कोटि का इस्पात बनाया जाता था। दिल्ली का लौह-स्तंभ तथा कोणार्क मंदिर की लोहे की कड़ियाँ इसके प्रमाण है। प्राचीन काल में लोहा-इस्पात का उत्पादन घरेलू उद्योगों में होता था। भारत में लोहा-इस्पात का सबसे पहला कारखाना 1830 में तमिलनाडु में पोर्टोनोवो (Portonovo) नामक स्थान पर स्थापित किया गया, परंतु प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण इसे बंद कर दिया गया। आधुनिक युग का पहला कारखाना 1874 ई०. में पश्चिम बंगाल में कुल्टी नामक स्थान पर खुला, जिसे बाद में “बराकर आयरन वर्क्स” के नाम से जाना गया। आधुनिक ढंग का बड़ा कारखाना 1907 ई० में झारखंड में स्वर्णरेखा घाटी के साकची नामक स्थान पर खुला।
इसका नाम “टाटा आयरन एण्ड स्टील कंपनी” (TISCO) रखा गया। इसके संस्थापक उद्योगपति जमशेदजी नौसेरवान जी टाटा थे, जिनके नाम पर इस स्थान का नाम जमशेदपुर या टाटा पड़ा। इसी के निकट बर्नपुर में 1919 ई० में एक कारखाना खोला गया, जो आज “इंडियन आयरन एण्ड स्टील कंपनी” (IISCO) के नाम से प्रसिद्ध है।
इसी में 1936 ई० में कुल्टी के “बराकर आयरन वर्क्स” को मिला दिया गया। दक्षिण भारत में 1923 ई० में कर्नाटक के भद्रावती नामक स्थान पर भद्रा नदी के किनारे एक कारखाना खोला गया, जो आज विश्वेश्वरैया आयरन एण्ड स्टील लिमिटेड (VISL) के नाम से जाना जाता है। इस प्रकार स्वतंत्रता के पूर्व भारत में जमशेदपुर, कुल्टी-बर्नपुर तथा भद्रावती में लोहा-इस्पात के कारखाने स्थित थे। ये सभी कारखाने निजी क्षेत्र में थे, किंतु भद्रावती के कारखाना को 1963 ई० में सरकारी नियंत्रण में ले लिया गया। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद लोहा-इस्पात उद्योग का विकास तेजी से हुआ। भिलाई (छत्तीसगढ), राउरकेला (उड़ीसा) और दुर्गापुर (पश्चिम बंगाल) के अतिरिक्त बोकारो (झारखंड), सलेम (तमिलनाडु), विशाखापटनम (आंध्र प्रदेश) और विजयनगर (कर्नाटक) में कारखाने खोले गए। ये सभी कारखाने सार्वजनिक क्षेत्र में स्थापित किए गए हैं तथा “स्टील ऑथरिटी ऑफ इंडिया “लिमिटेड (SAIL) के नियंत्रण में है, जिसे 1974 ई० में कायम किया गया।


Q13. भारत के लौह एवं इस्पात उद्योग के विकास के लिए उपलब्ध भौगोलिक दशाओं का वर्णन करें।

उत्तर लौह-इस्पात उद्योग आधारभूत उद्योग है। इससे विभिन्न कल-कारखानों के लिए मशीन तथा संयंत्र, कृषि के उपकरण तथा परिवहन के साधन बनाए जाते हैं। वास्तव में यह उद्योग आधुनिक सभ्यता की रीढ़ है। भारत में लोहा-इस्पात उद्योग की स्थापना के लिए उपयुक्त भौगोलिक दशाएँ मिलती है। यहाँ उच्च कोटि का हेमाटाइट लौह-अयस्क, बिटुमिनस कोयला, चूना-पत्थर, मैंगनीज इत्यादि पर्याप्त मात्रा में छत्तीसगढ़, उत्तरी उड़ीसा, झारखंड और पश्चिम बंगाल के अर्द्धचंद्रकार क्षेत्र में उपलब्ध है। ये सभी कच्चे माल स्थूल (भार ह्रास वाले) होते हैं। अतः इस उद्योग की स्थापना कच्चे माल के इन स्रोतों के निकट हुई है। इनके अतिरिक्त जल विद्युत, सस्ते श्रमिक, रेलमार्ग तथा जलमार्ग एवं देशी तथा विदेशी बाजारों की भी सुविधा उपलबध है। इसके परिणामस्वरूप इस प्रदेश में लौह-इस्पात उद्योग प्रारंभ में ही स्थापित कर दिया गया था।


Q14. ग्रामीण अधिवास के प्रतिरूप का वर्णन करें।

उत्तर बस्तियों के प्रारूप (Pattern of settlement) से तात्पर्य है बस्तियों का आकार (shape)। इस आधार पर बस्तियों के कई प्रारूप होते हैं, यथा (i) रैखिक (linear), वृत्ताकार (circular), आयताकार (rectangular), तारक (starlike), पंखाकार (Tanlikc), सीढ़ीनमा (terraced), विभजाकार (triangular) इत्यादि। इन्हें विभिन्न भौतिक, सांस्कृतिक, नजातीय, सुरक्षा और औद्योगिकी कारक प्रभावित करते हैं। भौतिक कारकों में उच्चावच, जलस्रोत (तालाव, नदी इत्यादि), जलवायु इत्यादि मुख्य हैं। समतल मैदानी क्षेत्र में आयताकार और पर्वतीय ढालों पर सीढ़ीनुमा प्रतिरूप पाया जाता है। मरुस्थलीय क्षेत्र में बालू से भरी आँधी से बचने के लिए चौकोर बस्ती बनायी जाती है और मकानों के दरवाजे बीच में खले रहते हैं। नदी के किनारे रैखिक और दो नदियों के संगम पर त्रिभुजाकार बस्ती विकसित होती है। तालाब के चारों ओर वृताकार अधिवास बनता है। पर्वतपदीय क्षेत्र में पंखाकार बस्ती बनती है। प्रायद्वीप के छोर पर तारक बस्ती का निर्माण होता है।


Q15. ग्रामीण अधिवासों का वर्गीकरण प्रस्तुत करें।

उत्तर विरल रूप से अवस्थित छोटी बस्तियाँ, जो कृषि अथवा अन्य प्राथमिक क्रियाकलापी में विशिष्टता प्राप्त कर लेती है, ग्रामीण बस्ती कहलाती हैं । निर्मित क्षेत्र के विस्तार, मकानों की संख्या और उनके बीच की पारस्परिक दूरी के आधार पर ग्रामीण बस्तियाँ चार प्रकार की होती हैं, यथा (i) गुच्छित बस्तियाँ, (ii) अर्द्ध-गुच्छित बस्तियाँ, (iii) पल्ली बस्तियाँ और (iv) परिक्षिप्त बस्तियाँ।

(i) गुच्छित बस्तियाँ (Clustered settelements) ⇒ ऐसी बस्तियों को संकेन्द्रित (concentrated), पुजित (clustered), अवकेन्द्रित (nucleated) और संकुलित (Agglomerated) बस्ती भी कहा जाता है। इस प्रकार की बस्तियों घरों के संहत खंड पाये जाते हैं और घरों को सँकरी तथा टेढ़ी-मेढ़ी गलियाँ पृथक करती हैं। –
(ii) अर्द्ध-गुच्छित बस्तियाँ (Semi-clustered settelements) ⇒ इसे विखडित बस्ती (Frag mented settlement) भी कहा जाता है। इसमें मकान एक दूसरे से अलग, लेकिन एक ही बस्ती में होते हैं। बस्ती कई खंडों में विभाजित रहती है। किन्तु उनका नाम एक ही होता है।
(ii) पल्ली बस्तियाँ (Hamleted settlements) यह मध्यम आकार की बस्तियाँ हैं, जिनमें एक बड़े गाँव से थोड़ी दूरी पर बसी छोटी-सी एक या अधिक बस्ती होती है। इन छोटी बस्तियों को पुरवा, पान्ना, पाड़ा, पल्ली, नगला इत्यादि कहा जाता है ।
(iv) परिक्षिप्त बस्तियाँ (Dispersed settlements) ⇒ इन्हें बिखरी हुई (scattered, sprinkled) या एकाकी (Isolated) बस्ती भी कहते हैं। भारत में ऐसी बस्ती सुदूर जंगलों में एकाकी झोपड़ियों अथवा कुछ झोपड़ियों की पल्ली अथवा छोटी पहाड़ियों की ढालों पर खेतों और चारागाहों के रूप में पायी जाती है।


Q16. आंतरिक प्रवास से आप क्या समझते हैं?

उत्तर अपने ही देश में एक गाँव से दूसरे गाँव या शहर या महानगरों में जाना आंतरिक प्रवास कहलाता है। गाँव से मजदूरी के लिए शहरों में तथा कृषि समुन्नत क्षेत्रों में मजदूरों और किसानों का. जाना इसके उदाहरण है। कभी-कभी विषम परिस्थितियों में कुछ समय के लिए समीपवर्ती क्षेत्र में प्रवास भी इसके अंतर्गत आते हैं। जाड़े के दिनों में हिमालय क्षेत्र के लोग कुछ  महीनों के लिए निचले भागों में चले जाते हैं। गर्मी में पुनः अपने गाँव आकर जीवन यापन करते हैं। यो तो आंतरिक प्रवास मूलतः आजीविका की खोज तथा जीवन के बेहतर अवसर के कारण होता है। किंतु, गाँव में कृषि भूमि की कमी, बेरोजगारी या अर्द्ध बेरोजगारी तथा सुविधाओं की कमी और नगरों में सविधाओं और सेवाओं की अधिकता, रोजगार के
अवसर, उच्च शिक्षा तथा उच्च जीवन स्तर के कारण-गाँवों से नगरों की ओर प्रवास होता है।

आंतरिक प्रवास के अंतर्गत चार धाराओं की पहचान की गई है—(1) ग्रामीण से ग्रामीण, in ग्रामीण से नगरीय, (iii) नगरीय से नगरीय और (iv) नगरीय से ग्रामीण। – आंतरिक प्रवास दो रूपों में होता है—अन्त:राज्यीय और अन्तरराज्यीय। अन्त:राज्यी प्रवास
एक राज्य या प्रांत के भीतर ही होता है, जबकि अंतरराज्यीय प्रवास एक राज्य से दूसरे राज्य . की ओर होता है। यह उल्लेखनीय है कि अन्तः राज्यीय और अन्तर राज्यीय दोनों प्रवास में गाँव से गाँव की ओर अधिकतर महिलाओं का प्रवास शादी के कारण होता है। गाँव से नगरों की ओर रोजगार के कारण पुरुष प्रवास अधिक होता है।


Q17. भारत में अन्तर्राष्ट्रीय प्रवास के कारणों की विवेचना कीजिए।

उत्तर भारत में अंतर्राष्ट्रीय प्रवास दो प्रकार के हुए हैं—(i) उत्प्रवास (Emigration), जिसके अंतर्गत भारत के अनेक लोग विदेशों में जाकर बस गये हैं, और (ii) आप्रवास (Immigration), जिसके अंतर्गत विदेशों से अनेक लोग भारत में आकर बस गये हैं। 2001 की जनगणना के अनुसार भारत में अन्य देशों से 50 लाख व्यक्तियों का आप्रवास हुआ है, जिनमें 59.8% बांग्लादेश से, 19.3% पाकिस्तान से और 11.6% नेपाल से आये हैं। जहाँ तक भारत से उत्प्रवास का प्रश्न है, ऐसा अनुमान है कि भारतीयं प्रसार (Indian Diaspora) के लगभग 2 करोड़ लोग हैं, जो 110 देशों में फैले हुए हैं।

‘भारत में अंतर्राष्ट्रीय प्रवास के मुख्यतः निम्नलिखित कारण हैं —

(i) आर्थिक कारण (Economic Factors) ⇒ आर्थिक अवसरों की तलाश में एक ओर भारत से व्यवसायी, शिल्पी, फैक्ट्री मजदूर थाइलैंड, मलेशिया, सिंगापुर, इंडोनेशिया इत्यादि देशों में, अर्द्धकुशल और कुशल श्रमिक प० एशिया के पेट्रोल उत्पादक देशों में तथा डॉक्टर, अभियंता, प्रबंध परामर्शदाता इत्यादि संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा, यूनाइटेड किंगडम इत्यादि देशों में गये तो दूसरी ओर नेपाल, तिब्बत इत्यादि देशों से लोग रोजगार के लिए भारत आये।

(ii) सामाजिक-राजनैतिक कारण (Socio-political Factors) ⇒ उपनिवेश काल में अंग्रेजों, फ्रांसीसियों, जर्मनों, डच और पुर्तगालियों द्वारा उत्तरप्रदेश और बिहार. से लाखों श्रमिकों को रोपण कृषि के लिए अनेक अफ्रीकी और लैटिन अमेरिकी देशों में भेजा गया। इन मजदूरों की दशाएँ दासों से बेहतर नहीं थी। आज भी उदारीकरण के पश्चात 90 के दशक में शिक्षा और ज्ञान , आधारित भारतीय उत्प्रवासियों ने भारतीय प्रसार को विश्व के सर्वाधिक शक्तिशाली प्रसार में से एक बना दिया है। इसके विपरीत, प्राचीन नालन्दा, विक्रमशिला इत्यादि में शिक्षा प्राप्त करने के लिए लाखों दक्षिण-पूर्वी एशियाई देश के लोग भारत आये। भारत-पाक विभाजन, बांग्लादेश का स्वतंत्रता संग्राम, तिब्बत विवाद इत्यादि ने भी लाखों शरणार्थियों को भारत आने को मजबूर कर दिया। इस प्रकार सामाजिक-राजनैतिक कारणों से भारत में अंतर्राष्ट्रीय आप्रवास और उत्प्रवास दोनों हुआ है।


Q18. भारतीय कृषि की समस्याओं की विवेचना कीजिए।

उत्तर भारत एक कृषि प्रधान देश है, जिसके 2/3 लोगों की जीविका कृषि पर आधारित है। कृषि देश की विशाल जनसंख्या के लिए भोजन प्रदान करती है तथा अनेक उद्योगों के लिए कच्चा माल का स्रोत है। देश की 24% आय कृषि से प्राप्त होती है। फिर भी भारतीय कृषि अनेक प्राकृतिक, आर्थिक, सामाजिक एवं संरचनात्मक समस्याओं से ग्रस्त हैं। भारतीय कृषि की मुख्य समस्याएँ एवं उनके समाधान निम्नलिखित हैं

i. प्राकृतिक समस्याएँ प्राकृतिक आपदा, जल-जमाव, परती तथा कृषियोग्य बंजरभूमि, मिट्टी अपरदन, मिट्टी का अत्यधिक उपयोग।

2. आर्थिक समस्याएँ ⇒ भारत के अधिकांश किसानों की आर्थिक दशा दयनीय है, क्योंकि भमि पर आधिपत्य में असमानता है, किसान निर्धन हैं. उत्पादन लागत अधिक है, तथा फसल उत्पादन का मूल्य कम मिलता है । इन समस्याओं का समाधान कृषि भूमि का उचित बँटवारा करके तथा किसानों को खेती करने के लिए उचित अर्थ एवं आदान उपलब्ध
कराकर किया जा सकता है।

3. समाजिक समस्याएँ भारतीय कृषि अनेक सामाजिक समस्याओं से भी ग्रसित हैं। इनमें कृषि-भूमि पर जनसंख्या का बढ़ता बोझ, भूमि सुधार कार्यक्रमों का अप्रभावशाली कार्यान्वयन, किसानों को तिरष्कार की दृष्टि से देखना तथा शिक्षा की कमी उल्लेखनीय है।

4. संरचनात्मक समस्याएँ भारत में कृषि संबंधी अधिसंरचना की कमी है। देश के मात्र एक तिहाई कृषि क्षेत्रों को सिंचाई की सुविधा प्राप्त है। रासायनिक खाद, उन्नत बीज, ऋण सुविधा इत्यादि का अभाव है। यातायात के साधन, भंडारण तथा व्यवस्थित बाजार के अभाव में बिचौलिये उनका शोषण करते हैं। खेती का ढंग पुराना है, खेती में दुर्बल पशु का प्रयोग होता है और उनके लिए चारा की कमी है। परिणामस्वरूप यहाँ प्रति हेक्टेयर उत्पादन कम है। प्रति हेक्टेयर उत्पादन बढ़ाने के लिए निम्नलिखित उपाय किए जा सकते हैं (i) सिंचाई की व्यवस्था, बाढ़ और सूखा से सुरक्षा, (ii) उर्वरक का प्रयोग, (iii) कीट एवं रोग नाशक दवाएँ और पौधा संरक्षण, (iv) उन्नत संकर बीज का प्रयोग, (v) मिट्टी सर्वेक्षण, उर्वरीकरण एवं संरक्षण, (vi) गहन जुताई, कटाई और परिष्करण के लिए कृषि-यंत्रों की व्यवस्था, (vii) विद्युत, यातायात, भंडारण, क्रय-विक्रय (विपणन) की व्यवस्था, (viii) लागत के अनुसार उपज का मूल्य-निर्धारण, (ix) जोतों का एकीकरण और (x) कृषि-मंडियों की स्थापना।


Q19. गहन निर्वाह कृषि की विशेषताओं का वर्णन कीजिए।

उत्तर यह कृषि पद्धति संसार के घने बसे क्षेत्रों में प्रचलित है। यहाँ भूमि पर जनसंख्या का दबाव बहुत अधिक है, अतः प्रति व्यक्ति कृषि भूमि की उपलब्धता निम्न है। खेत बिखरे और . छोटे होते हैं, किसान साधारण तथा निर्धन होते हैं, पुराने औजार और मानव तथा पशु श्रम का अधिक प्रयोग होता है, नये मशीनों का प्रयोग कम होता है तथा पूंजी निवेश भी कम होता है। रासायनिक खादों और सिंचाई के साधनों का इस्तेमाल कम होता है। मानसूनी वर्षा पर निर्भरता अधिक रहती है। इसके बावजूद इस क्षेत्र में प्रति हेक्टर उत्पादन अधिक होता है। इसका कारण यह है कि यह खेती एक जीवन शैली बन गई है। खेत किसानों का एक
प्रकार का बगीचा होता है, जिसमें दिन-रात परिश्रम करके अधिकाधिक उत्पादन करते हैं और एक-एक इंच भूमि पर फसल उपजाते हैं। यहाँ वर्ष में दो-तीन फसलें और एक फसल मौसम में कई फसलें उपजायी जाती हैं। फसलों में खाद्यान्न की प्रधानता रहती है; अन्य फसलें आवश्यकतानुसार उपजाई जाती हैं। गहन निर्वाहन कृषि मानसून जलवायु वाले दक्षिणी एवं दक्षिणी पूर्वी एशिया में प्रचलित है। इस क्षेत्र में अत्यधिक घनी जनसंख्या के कारण उत्पादन निर्वाहस्तर पर ही रहता है और बिक्री के लिए अवशेष बहुत कम बचता है। इसी कारण इसे निर्वाहन कृषि कहा जाता है। जलवायु में प्रादेशिक भिन्नता के कारण गहन निर्वाहन कृषि मुख्यतः दो प्रकार की होती हैं (i) चावल प्रधान गहन निर्वाहन कृषि, (ii) चावल विहीन गहन निर्वाहन कृषि। ।


Q20. स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत में हुए कृषि विकास की व्याख्या करें।

उत्तर कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था का आधार है, जो देश के 57% भू-भाग पर की जाती ह और जिस पर देश की 53% जनसंख्या आश्रित है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बोद भारत ने कृषि में प्रयाप्त प्रगति की है। बीसवीं शताब्दी के मध्य तक इसकी दशा दयनीय थी। अकाल, सूखा और पश विभाजन के बाद एक तिहाई सिंचित क्षेत्र का पाकिस्तान में चला जाना ऐसी समस्याएँ थीं, जिससे निपटने के लिए स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद खाद्यान्न का उत्पादन बढ़ाना आवश्यक हो गया। इसके लिए कषि विकास की रणनीति के अंतर्गत कई उपाय अपनाए गए, जिनमें (i) व्यापारिक फसलों की जगह खाद्यान्नों का उपजाना, (ii) कृषि गहनता को बढ़ाना तथा (iii) कृषि योग्य बंजर तथा परती भूमि को कृषि भूमि में परिवर्तित करना शामिल है। प्रारंभ में इस नीति से खाद्यान्नों का उत्पादन बढ़ा, किन्तु बाद में यह स्थिर हो गया। इस समस्या से उभारने के लिए 1961 में गहन कृषि जिला कार्यक्रम (IADP) और गहन कृषि क्षेत्र कार्यक्रम (IAAP) प्रारंभ किये गये। लेकिन 1960 के दशक के अकाल और खाद्यान्न के आयात की बाध्यता ने सरकार को विभिन्न कार्यक्रमों को कार्यान्वित करने पर बाध्य कर दिया। सरकार ने अधिक उपज देने वाले गेहूँ के बीज मेक्सिको से तथा चावल के बीज फिलिपींस से आयात किए। इसके अतिरिक्त सिंचित क्षेत्र का विस्तार किया गया, रासायनिक खाद, कीटनाशक और कृषि यंत्र के प्रयोग पर जोर दिया गया। इन प्रयासों के फलस्वरूप खाद्यान्नों के उत्पादन में बहुत वृद्धि हुई और इसे “हरितक्रान्ति” के नाम से जाना गया। देश खाद्यान्न में आत्मनिर्भर हो गया। किन्तु हरित क्रांति का लाभ पंजाब, हरियाणा, उत्तरप्रदेश, आंध्रप्रदेश और गुजरात के सिंचित क्षेत्र तक ही सीमित रहा और देश में कृषि विकास में प्रादेशिक असमानता बढ़ गई। 1980 ई० के बाद यह प्रौद्योगिकी देश के मध्य और पूर्वी भाग में पहुँची।
1980 के दशक में योजना आयोग ने वर्षा आधारित क्षेत्र की कृषि पर ध्यान दिया और 1988 में कृषि विकास में प्रादेशिक संतुलन लाने के लिए कृषि, पशुपालन तथा जलकृषि के विकास के लिए संसाधनों के विकास पर बल दिया। 1990 के दशक की उदारीकरण नीति तथा उन्मुक्त बाजार अर्थव्यवस्था ने भी भारतीय कृषि विकास को प्रभावित किया है।

बिहार बोर्ड कक्षा 12 भूगोल का लघु उत्तरीय प्रश्न उत्तर 2024

S.N भूगोल ( लघु उत्तरीय प्रश्न उत्तर ) 20 Marks 
1Geography ( लघु उत्तरीय प्रश्न ) PART – 1
2.Geography ( लघु उत्तरीय प्रश्न ) PART – 2
3.Geography ( लघु उत्तरीय प्रश्न ) PART – 3
4.Geography ( लघु उत्तरीय प्रश्न ) PART – 4
5.Geography ( लघु उत्तरीय प्रश्न ) PART – 5
6.Geography ( लघु उत्तरीय प्रश्न ) PART – 6
7.Geography ( लघु उत्तरीय प्रश्न ) PART – 7
8.Geography ( लघु उत्तरीय प्रश्न ) PART – 8
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