कक्षा 12 राजनीति विज्ञान ( दीर्घ उत्तरीय प्रश्न उत्तर ) 2024 ( 15 Marks ) | PART – 2

इंटर बोर्ड परीक्षा 2024 के लिए यहां पर आज के इस पोस्ट में राजनीति विज्ञान ( Political Science ) का दीर्घ उत्तरीय प्रश्न उत्तर 2024 दिया गया है। यह प्रश्न उत्तर इंटर बोर्ड परीक्षा 2024 में ( 15 Marks ) के पूछे जाएंगे। इसलिए राजनीति विज्ञान कक्षा 12 दीर्घ उत्तरीय प्रश्न उत्तर को शुरू से अंत तक जरूर पढ़ें।


कक्षा 12 राजनीति विज्ञान ( दीर्घ उत्तरीय प्रश्न उत्तर ) 2024 ( 15 Marks ) | PART – 2

Q11. 9/11 और आतंकवाद के विरुद्ध विश्वव्यापी युद्ध पर एक लेख लिखिए।

उत्तर ⇒  9/11 और आतंकवाद के विरुद्ध विश्वव्यापी युद्ध (9/11 and the Global War on Terror)

(i) पष्ठभमि (Background) − 11 सितंबर, 2001 ई० के दिन विभिन्न अरब देशों के 19 जाणकर्ताओं ने उड़ान भरने के चंद मिनटों बाद चार अमेरिकी व्यावसायिक विमानों पर कब्जा कर लिया। अपहरणकर्ता इन विमानों को अमेरिका की महत्त्वपूर्ण इमारतों की सीध में उड़ाकर ले गये। दो विमान न्यूयार्क स्थित वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के उत्तरी और
दक्षिणी टावर से टकराए। तीसरा विमान वर्जिनिया के अर्लिंगटन स्थित ‘पेंटागन’ से टकराया। ‘पेंटागन’ में अमेरिकी रक्षा विभाग का मुख्यालय है। चौथे विमान को अमेरिकी काँग्रेस की मुख्य इमारत से टकराना था लेकिन यह पेन्सिलवेनिया के एक खेत में गिर गया। इस हमले को ‘नाइन एलेवन’ कहा जाता है।
(ii) आतंकवादी हमले के प्रभाव − इस हमले में लगभग तीन हजार व्यक्ति मारे गये। अमेरिकियों के लिए यह दिल दहला देने वाला अनुभव था। उन्होंने इस घटना की तुलना 1814 और 1941 की घटनाओं से की 1814 में ब्रिटेन ने वाशिंगटन डीसी में आगजनी की थी और 1941 में जापानियों ने पर्ल हार्बर पर हमला किया था। जहाँ तक जान-माल की हानि का सवाल है तो अमेरिकी जमीन पर यह अब तक का सबसे गंभीर हमला था। अमेरिका 1776 में एक देश बना और तब से उसने इतना बड़ा हमला नहीं झेला था।
(iii) (Reaction of Ainerica)

(a) 9/11 के जवाब में अमेरिका ने कदम उठाये और भयंकर कार्यवाही की। अब क्लिंटन की जगह रिपब्लिकन पार्टी के जॉर्ज डब्ल्यू. बुश राष्ट्रपति थे। ये पूर्ववर्ती राष्ट्रपति एच. डब्ल्यू. बुश के पुत्र . हैं। क्लिंटन के विपरीत बुश ने अमेरिकी हितों को लेकर कठोर रवैया अपनाया और इन हितों को बढ़ावा देने के लिए कड़े कदम उठाये।।
(b) ‘आतंकवाद के विरुद्ध विश्वव्यापी युद्ध’ के अंग के रूप में अमेरिका ने ‘ऑपरेशन एण्डयूरिंग फ्रीडम’ चलाया। यह अभियान उन सभी के खिलाफ चला जिन पर 9/11 का शक था। इस अभियान में मुख्य निशाना अल-कायदा और अफगानिस्तान के तालिबान-शासन को बनाया गया। तालिबान के शासन के पाँव जल्दी ही उखड़ गए लेकिन तालिबान और
अल-कायदा के अवशेष अब भी सक्रिय हैं। 9/11 की घटना के बाद से अब तक इनकी तरफ से पश्चिमी मुल्कों में कई जगहों पर हमले हुए हैं। इससे इनकी सक्रितया की बात स्पष्ट हो जाती है।
(c) अमेरिकी सेना ने पूरे विश्व में गिरफ्तारियाँ की। अक्सर गिरफ्तार लोगों को अलग-अलग देशों में भेजा गया और उन्हें खुफिया जेलखानों में बंदी बनाकर रखा गया। क्यूबा के निकट अमेरिकी नौसेना का एक ठिकाना ग्वांतानामो वे में है। कुछ बंदियों को वहाँ रखा गया। इस जगह रखे गये बंदियों को न तो अंतर्राष्ट्रीय कानूनों की सुरक्षा प्राप्त है और न ही
अपने देश या अमेरिका के कानूनों की। संयुक्त राष्ट्रसंघ के प्रतिनिधियों तक को इन बंदियों से मिलने की अनुमति नहीं दी गई।


Q12. ‘बांग्लादेश में लोकतंत्र’ विषय पर एक लेख लिखिए।

उत्तर ⇒ बांग्लादेश में लोकतंत्र (Democraey in Bangladesh)

1. (a) पृष्ठभूमि (Background)-1947 से 1971 तक बांग्लादेश पाकिस्तान का अंग था। अंग्रेजी राज के समय के बंगाल और असम के विभाजित हिस्सों से पूर्वी पाकिस्तान का यह क्षेत्र बना था। इस क्षेत्र के लोग पश्चिमी पाकिस्तान के दबदबे और अपने ऊपर उर्दू भाषा को लादने के खिलाफ थे। पाकिस्तान के निर्माण के तरंत बाद ही यहाँ के लोगों ने बंगाली संस्कृति और भाषा के साथ किए जा रहे दुर्व्यवहार के खिलाफ विरोध जताना शरू कर दिया। इस क्षेत्र की जनता ने प्रशासन में और समुचित प्रतिनिधित्व तथा राजनीतिक सत्ता में समुचित हिस्सेदारी की मांग भी उठायी।

(b) पश्चिमी पाकिस्तान के प्रभुत्व के खिलाफ जन-संघर्ष का नेतृत्व शेख मुजीबुर्रहमान के किया। उन्होंने पूर्वी क्षेत्र के लिए स्वायत्तता की मांग की। शेख मुजीबुर्रहमान के नेतृत्व वाली आ लीग को 1970 के चुनावों पूर्वी पाकिस्तान के लिए प्रस्तावित संविधान सभा में बहुमत हासिल हो गया लेकिन सरकार पर पश्चिमी पाकिस्तान के नेताओं का दबदबा था और सरकार ने इस सभा को आहत करने से इंकार कर दिया।

(c) शेख मुजीबुर को गिरफ्तार कर लिया गया। जनरल याहिया खान के सैनिक शासन में पाकिस्तानी सेना ने बंगाली जनता के जन-आंदोलन को कुचलने की कोशिश की। हजारों लोग पाकिस्तानी सेना के हाथों मारे गए। इस वजह से पूर्वी पाकिस्तान से बड़ी संख्या में लोग भारत पलायन कर गए। भारत के सामने इन शरणार्थियों को सँभालने की समस्या
आ खड़ी हुई।

2. भारत का समर्थन (Support of India) भारत की सरकार ने पूर्वी पाकिस्तान के लोगों की आजादी की माँग का समर्थन किया और उन्हें वित्तीय और सैन्य सहायता दी। इसके परिणामस्वरूप 1971 में भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध छिड़ गया। युद्ध की समाप्ति पूर्वी पाकिस्तान में पाकिस्तानी सेना के आत्मसमर्पण तथा एक स्वतंत्र राष्ट्र ‘
बांग्लादेश’ के निर्माण के साथ हुई। बांग्लादेश ने अपना संविधान बनाकर उसमें अपने को एक धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक तथा समाजवादी देश घोषित किया। बहरहाल, 1975 में शेख मुजीबुर्रहमान ने संविधान में संशोधन प्रणाली को मान्यता मिली। शेख मुजीबुर ने अपनी पार्टी आवामी लीग को छोड़कर अन्य सभी पार्टियों को समाप्त कर दिया। इससे तनाव और
संघर्ष की स्थिति पैदा हुई।

3. सैनिक विद्रोह (1975) अन्ततः लोकतंत्र की पुनः स्थापना (Military Revolt (1975) and at less democracy was re-stablished)

(a) 1975 के अगस्त में सेना ने उनके खिलाफ बगावत कर दिया और इस नाटकीय तथा त्रासद घटनाक्रम में शेख मुजीबुर सेना के हाथों मारे गए। नये सैनिक-शासन जियाऊर्रहमान ने अपनी बांग्लादेश नेशनल पार्टी बनायी और 1979 के चुनाव में विजयी रहे। जियाऊर्रहमान की हत्या हुई और लेफ्टिनेंट जनरल एच. एम. इरशाद के नेतृत्व में बांग्लादेश में
एक और सैनिक-शासन ने बागडोर संभाला।

(b) बांग्लादेश की जनता जल्दी ही लोकतंत्र के समर्थन में उठ खड़ी हुई। आंदोलन में छात्र आगे-आगे चल रहे थे। बाध्य होकर जनरल इरशाद ने एक हद तक राजनीतिक गतिविधियों की छूट दी। इसके बाद के समय में जनरल इरशाद पाँच सालों के लिए राष्ट्रपति निर्वाचित हुए। जनता के व्यापक विरोध के आगे झुकते हुए लेफ्टिनेंट जनरल इरशाद को राष्ट्रपति
का पद 1990 में छोड़ना पड़ा। 1991 में चुनाव हुए। इसके बाद से बांग्लादेश में बहुदलीय चुनावों पर आधारित प्रतिनिधिमूलक लोकतंत्र कायम है। 2016 में भारत और बंगलादेश में एक समझौता हुआ जिसमें दोनों देशों के बीच आपसी ‘सहयोग में वृद्धि हुई।


Q13. नक्सलवादी आंदोलन पर एक निबंध लिखिए।

उत्तर ⇒ 1. नक्सलवादी आंदोलन की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि ⇔  पश्चिम बंगाल के पर्वतीय जिले दार्जिलिंग के नक्सलवादी पुलिस थाने के इलाके में 1967 में एक किसान विद्रोह उठ खड़ा हुआ। इस विद्रोह की अगुआई मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के स्थानीय कैडर के लोग कर रहे थे। नक्सलवादी पुलिस थाने से शुरू होने वाला यह आंदोलन भारत के कई राज्यों में फैल गया। इस आंदोलन को नक्सलवादी आंदोलन के रूप में जाना जाता है।

2. सी. पी. आई. से अलग होना और गरिल्ला युद्ध प्रणाली को अपनाना ⇔   1969 में नक्सलवादी सी० पी० आई० (एम) से अलग हो गए और उन्होंने सीपीआई (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) नाम से एक नई पार्टी चारु मजदूमदार के नेतृत्व में बनायी। इस पार्टी की दलील थी कि भारत में लोकतंत्र एक
छलावा है। इस पार्टी ने क्रांति करने के लिए गुरिल्ला युद्ध की रणनीति अपनायी।
3. कार्यक्रम  – नक्सलवादी आंदोलन ने धनी भूस्वामियों से जमीन बलपूर्वक छीनकर गरीब और भूमिहीन लोगों को दी। इस आंदोलन के समर्थक अपने राजनीतिक लक्ष्यों को हासिल करने के लिए हिंसक साधनों के इस्तेमाल के पक्ष में दलील देते थे।
4. नक्सलवाद का प्रसार और प्रभाव  ⇔  1970 के दशक वर्षों में 9 राज्यों के लगभग 75 जिले नक्सलवादी हिंसा से प्रभावित हैं। इनमें अधिकतर बहुत पिछड़े इलाके हैं यहाँ आदिवासियों की जनसंख्या ज्यादा है। इन इलाकों के नक्सलवाद की पृष्ठभूमि पर अनेक फिल्में भी बनी हैं। उपन्यास पर आधारित ‘हजार चौरासी की माँ’ ऐसी ही में बँटाई या पट्टे पर खेतीबाड़ी करने वाले तथा छोटे किसान ऊपज में हिस्से, पट्टे की सुनिश्चित कामकाजी महिलाओं वाले परिवार में दहेज की प्रथा का चलन कम है।
5. नक्सलवादी आंदोलन और काँग्रेस सरकार ⇔  (क) 1969 में काँग्रेस शासित पश्चिम बंगाल सरकार ने निरोधक नजरबंदी समेत कई कड़े कदम उठाए, लेकिन नक्सलवादी आंदोलन रुक न सका। बाद के सालों में य कई अन्य भागों में फैल गया। नक्सलवादी आंदोलन अब कई दलों और संगठनों में बंट चका था। इन दलों में से कुछ जैसे सी० पी० आई० (एम एल-लिबरेशन) खुली लोकतांत्रिक राजनीति में भागीदारी करते हैं।

(ख) सरकार ने नक्सलवादी आंदोलन से निपटने के लिए कड़े कदम उठाए हैं। मानवाधिकार समहों ने सरकार के इन कदमों की आलोचना करते हए कहा है कि वह नक्सलवादियों से निपटने के क्रम में संवैधानिक मानकों का उल्लंघन कर रही है। नक्सलवादी हिंसा और नक्सल विरोध सरकारी कार्रवाई में हजारों लोग अपनी जान गँवा चुके हैं।


Q14. क्या आप शराब विरोधी आंदोलन को महिला-आंदोलन का दर्जा देंगे? कारण बताएँ।

उत्तर ⇒ हाँ हम शराब विरोधी आंदोलन को महिला आंदोलन का दर्जा देंगे। क्योंकि (a) यह आंदोलन दक्षिणी राज्य आंध्र प्रदेश में ताड़ी-विरोधी आंदोलन महिलाओं का एक स्वतः स्फूत आंदोलन था ये महिलाएं अपने आस-पड़ोस में मदिरा की बिक्री पर पाबंदी की मांग कर रही थी। वर्ष 1992 के सितंबर और अक्टूबर माह से ग्रामीण महिलाओं ने शराब के खिलाफ लड़ाई छेड़ रखी थी। यह लड़ाई माफिया और सरकार दोनों के खिलाफ थी। इस आंदोलन ने ऐसा रूप धारण किया कि इसे राज्य में ताड़ी-विरोधी आंदोलन के रूप में जाना गया।
(b) आंध्र प्रदेश के नेल्लौर जिले के एक दूर-दराज के गाँव दूबरगंटा में 1990 के शुरूआती दौर में महिलाओं के बीच प्रौढ़-साक्षरता कार्यक्रम चलाया गया जिसमें महिलाओं ने बड़ी संख्या में पंजीकरण कराया। कक्षाओं में महिलाएं घर के पुरुषों द्वारा देशी शराब, ताड़ी आदि पीने की शिकायतें करती थीं। ग्रामीणों को शराब की गहरी लत लग चुकी थी। इसके चलते वे शारीरिक और मानसिक रूप से भी कमजोर हो गए थे। शराबखोरी से क्षेत्र की ग्रामीण अर्थव्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हो रही थी। शराब की खपत बढ़ने से कर्ज का बोझ बढ़ा। पुरुष अपने काम से लगातार गैर-हाजिर रहने लगे। शराब के ठेकेदार ताड़ी व्यापार एक एकाधिकार बनाये रखने के लिए अपराधों में व्यस्त थे। शराबखोरी से सबसे ज्यादा दिक्कत महिलाओं को रही थी। इससे परिवार की अर्थव्यवस्था चरमराने लगी। परिवार में तनाव और मारपीट का माहौल बनने लगा। नेल्लोर में महिलाएँ ताड़ी के खिलाफ आगे आई और उन्होंने शराब की दुकानों को बंद कराने के लिए दबा बनाना शरू कर दिया। यह खबर तेजी से फैली और करीब 5000 गाँवों की महिलाओं ने आंदोलन में भाग लेना शुरू कर दिया। प्रतिबंध-संबंधी एक प्रस्ताव को पास कर इसे जिला कलेक्टर को भेजा गया। नेल्लोर जिले में ताड़ी की नीलामी 17 बार रद्द हुई। नेल्लोर जिले का यह आंदोलन धीरे-धीरे पूरे राज्य में फैल गया।
(c) ताड़ी विरोधी आंदोलन से अपने जीवन से जुड़ी सामाजिक समस्याएँ जैसे-दहेज प्रथा घरेलू हिंसा, घर से बाहर यौन उत्पीडन, समाज में महिलाओं पर हो रहे अत्याचार, परिवार में लैंगिक भेदभाव आदि के विरुद्ध उन्होंने व्यापक जागरूकता पैदा की।
(d) महिलाओं ने पंचायतों, विधान सभाओं, संसद ने अपने लिए एक-तिहाई स्थानों के आरक्षण और सरकार के सभी विभागों जैसे-वायुयान, पुलिस सेवाएँ आदि में समान अवसरों और पदोन्नति की बात की। उन्होंने न केवल धरने दिए, प्रदर्शन किए, जुलूस निकाले बल्कि विभिन्न मुद्दों पर महिला आयोग, राष्ट्रीय आयोग और लोकतांत्रिक मंचों से भी आवाज उठाई।
(e) संविधान में 73वाँ व 74वाँ संशोधन हुआ। स्थानीय निकायों में महिलाओं के स्थान आरक्षित हो गए। विधानसभाओं और संसद में आरक्षण के लिए विधेयक, अभी पारित नहीं हुए हैं। अनेक राज्यों में शराब बंदी लागू कर दी है और महिलाओं के विरुद्ध अत्याचारों पर कठोर दंड दिए जाने की व्यवस्था की गई है।


Q15. भारत में स्त्री उत्थान के लिए उठाए गए कदमों का वर्णन कीजिए।

उत्तर ⇒ स्त्री उत्थान के लिए उठाए गए कदम स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद भारत ने स्त्रियों की दशा में सुधार लाने के लिए बहुत-से कदम उठाए गए हैं

1. महिला अपराध प्रकोष्ठ तथा परिवार न्यायपालिका − यह महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों को रोकने के लिए सुनवाई करते हैं। विवाह, तलाक, दहेज, पारिवारिक मुकदमे भी सुनते हैं।
2. सरकारी कार्यालयों में महिलाओं की भर्ती − लगभग सभी सरकारी कार्यालयों में महिला कर्मचारियों की नियुक्ति की जाती है। अब तो वायुसेना, नौसेना तथा थलसेना और सशस्त्र सेनाओं के तीनों अंगों में अधिकारी पदों पर स्त्रियों की भर्ती पर लगी रोक को हटा लिया गया है। सभी क्षेत्रों में महिलाएं कार्य कर रही हैं।
3. स्त्री शिक्षा(Women Education) − स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् भारत में स्त्री शिक्षा का काफी विस्तार हुआ है।
4. राष्ट्रीय महिला आयोग − 1990 के एक्ट के अंतर्गत एक राष्ट्रीय महिला आयोग की स्थापना की गई है। महाराष्ट्र, गुजरात, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा, दिल्ली, पंजाब, कर्नाटक, असम एवं गुजरात राज्यों में भी महिला आयोगों की स्थापना की जा चुकी है। ये आयोग महिलाओं पर हए अत्याचार,
उत्पीड़न, शोषण तथा अपहरण आदि के मामलों की जाँच पडताल करते हैं। सभी राज्यों में महिला आयोग स्थापित किए जाने की मांग जोर पकड़ रही है और इन आयोगों को प्रभावी बनाने की मांग भी जोरों पर है।

5. महिलाओं का आरक्षण − महिलाएँ कुल जनसंख्या को लगभग 50 प्रतिशत हैं परंतु सरकारी कार्यालयों, संसद, राज्य विधान मंडलों आदि में इनका सख्या बहुत कम है। 1993 के 73वें व 74वें संविधान संशोधनों द्वारा पंचायती राज संस्थाओं तथा नगरपालिकाओं में एक-तिहाई स्थान महिलाओं के लिए आरक्षित कर दिए गए हैं। ससद तथा राव विधानमंडलों में भी प्रयास किया जा रहा है । है तो विभिन्न दल लग जा राजनैतिक दल इसके सात समथ में भी इसी प्रकार आरक्षण किए जाने की माँग जोर पकट रही परंत सर्वसम्मति के अभाव में जब भी यह विधेयक संसद में लाया जाता लग जाते हैं। अभी तक यह विधेयक पारित नहीं कराया गया है यद्यपि सभी के समर्थन में बातें तो बहुत करते हैं पर किसी ने ईमानदारी से इस विधेयक का करने की ओर ध्यान नहीं दिया है। क्त प्रयासों के अतिरिक्त अखिल भारतीय महिला परिषद् तथा कई अन्य महिला संगठन के अत्याचार, उत्पीड़न और अन्याय से बचाने, उन पर अत्याचार तथा बलात्कार करने वाले शियों को दंड दिलवाने तथा महिलाओं की स्थिति में सुधार लाने के
लिए प्रयत्नशील हैं।


Q16. द्रविड़ आंदोलन पर एक निबंध लिखिए।

उत्तर ⇒ द्रविड़ आंदोलन (Dravidian Movement)

 1. प्रस्तावना (Introduction) − द्रविड़ आंदोलन भारत के क्षेत्रीय आंदोलनों में से एक शक्तिशाली आंदोलन था देश की राजनीति में यह आंदोलन क्षेत्रीयवादी भावनाओं की सर्वप्रथम और सबसे प्रबल अभिव्यक्ति था।

II. आंदोलन का बदला स्वरूप − सर्वप्रथम इस आंदोलन के नेतृत्व के एक हिस्से की आकांक्षा (aspiration) एक स्वतंत्र द्रविड़ राष्ट्र बनाने की थी, परंतु आंदोलन ने तभी सशस्त्र संघर्ष (Armed Rebellion) का मार्ग नहीं अपनाया। इस आंदोलन के प्रारंभ में द्रविड़ भाषा में एक बहुत ज्यादा लोकप्रिय नारा दिया था जिसका हिंदी रूपान्तर है- ‘उत्तर हर दिन बढ़ता जाए, दक्षिण दिन-दिन घटता जाए’। द्रविड़ आंदोलन अखिल दक्षिण भारतीय संदर्भ में अपनी बात रखता था लेकिन अन्य दक्षिणी राज्यों से समर्थन न मिलने के कारण यह आंदोलन धीरे-धीरे तमिलनाडु तक ही सिमट कर रह गया। उपर्युक्त नारे में यह स्पष्ट है इसके संचालक देश के उत्तर और दक्षिण दो विशाल भागों में विभाजन चाहते थे।

III. नेतृत्व और तरीके −  द्रविड़ आंदोलन का नेतृत्व तमिल सुधारक नेता ई. वी. रामास्वामी नायकर जो पेरियार के नाम से प्रसिद्ध हुए, के हाथों में था। पेरियार ने अपने नेतृत्व में द्रविड़ आंदोलन की माँग आगे बढ़ाने के लिए सार्वजनिक बहसें (Public Debates) और चुनावी मंच का ही प्रयोग किया।


Q17. असम आंदोलन सांस्कृतिक अभियान आर्थिक पिछड़ेपन की मिली-जुली अभिव्यक्ति था। व्याख्या कीजिए।

उत्तर ⇒ असम आंदोलन का स्वरूप निःसंदेह असम आंदोलन सांस्कृतिक अभियान और आर्थिक पिछड़ेपन की (मुख्यतः) मिली-जुली अभिव्यक्ति था। हम निम्न तथ्यों और बिंदुओं के आधार पर इस कथन की व्याख्या कर सकते हैं

(i) असम पूर्वोत्तर में सबसे बड़ा और ऐतिहासिक दृष्टि से प्राचीनतम राज्य रहा है। कुल मिलाकर पूर्वोत्तर क्षेत्र में 7 राज्य हैं जिनमें चलाए गए समय-समय पर आंदोलन असम आंदोलन के हिस्से ही हैं। पूर्वोत्तर में बड़े पैमाने पर अप्रवासी आए हैं। इससे एक खास समस्या पैदा हुई है। स्थानीय जनता इन्हें ‘बाहरी’ समझती है और ‘बाहरी’ लोगों के खिलाफ उसके मन में गुस्सा है। भारत के दूसरे राज्यों अथवा किसी अन्य देश से आए लोगों को यहाँ की जनता रोजगार के अवसरों और राजनीतिक सत्ता के एतबार से एक प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखती है। स्थानीय लोग बाहर से आए लोगों के बारे में मानते हैं कि ये लोग यहाँ की जमीन हथिया रहे हैं। पूर्वोत्तर के कई राज्या में इस मसले ने राजनीतिक रंग ले लिया है और कभी-कभी इन बातों के कारण हिंसक घटनाएं
भी होती हैं।
(ii) 1979 से 1985 तक चला असम आंदोलन ‘बाहरी’ लोगों के खिलाफ चले आदा का सबसे अच्छा उदाहरण है। असमी लोगों को संदेह था कि बांग्लादेश से आकर बहुत अस्लम आबादी असम में बसी हई थी। लोगों के मन में यह भावना घर कर गई थी कि इन लागा को पहचानकर उन्हें अपने देश नहीं भेजा गया तो स्थानीय असमी जनता अल्पस “
कुछ आर्थिक मसले भी थे। असम में तेल, चाय और कोयला जैसे प्राकृतिक सर माजूदगी के बावजूद व्यापक गरीबी थी। यहाँ की जनता ने माना कि असम क प्राकृत बाहर भेजे जा रहे हैं और असमी लोगों को कोई फायदा नहीं हो रहा है।

(iii) 1979 में ऑल असम स्टूडेंटस् यूनियन (आसू − AASU) ने विदेशियों के विरोध में आंदोलन चलाया। ‘आसू’ एक छात्र-संगठन था और इसका जुड़ाव किसी भी राजनीतिक दल नहीं था। ‘आसू’ का आंदोलन अवैध अप्रवासी, बंगाली और अन्य लोगों के दबदबे तथा मतदाता कर लेने के खिलाफ था। आंदोलन की माँग थी कि 1951 के बाद जितने भी लोग असम आकर बसे हैं उन्हें असम से बाहर भेजा जाए। इस आंदोलन ने नए तरीकों को आजमाया और असमी जनता के हर तबके का समर्थन हासिल किया।
इस आंदोलन को पूरे असम में समर्थन मिला आंदोलन के दौरान हिंसक और त्रासद घटनाएँ भी हई। बहुत-से लोगों को जान गंवानी पड़ी और धन-संपत्ति का नुकसान हुआ। आंदोलन के दौरान रेलगाड़ियों की आवाजाही तथा बिहार स्थित बरौनी तेलशोधक कारखाने को तेल-आपूर्ति रोकने की भी कोशिश की गई।

(Iv)समझौता (Agreement) − छह साल की सतत अस्थिरता के बाद राजीव गाँधी के नेतृत्व वाली सरकार ने ‘आसू’ के नेताओं से बातचीत शुरू की । इसके परिणामस्वरूप 1985 में एक समझौता के अंतर्गत तय किया गया कि जो लोग बांग्लादेश-युद्ध के दौरान अथवा उसके बाद के सालों में असमय आए हैं, उनकी पहचान की जाएगी और उन्हें वापस भेजा जाएगा। आंदोलन की कामयाबी के बाद ‘आसू’ और असमगण संग्राम परिषद् ने साथ मिलकर अपने को एक क्षेत्रीय राजनीतिक पार्टी के रूप में संगठित किया। इस पार्टी का नाम असमगण परिषद् रखा गया। असमगण परिषद् 1985 में इस वायदे के साथ सत्ता में आई थी कि विदेशी लोगों की समस्या को सुलझा लिया जाएगा और एक ‘स्वर्णिम असम’ का निर्माण किया जाएगा।

(v) शांति प्रदेश और क्षेत्र − असम-समझौता से शांति कायम हुई और प्रदेश की राजनीति का चेहरा भी बदला लेकिन ‘अप्रवास’ की समस्या का समाध न नहीं हो पाया। ‘बाहरी’ का मसला अब भी असम और पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों में राजनीति में एक जीवंत मसला है। यह समस्या त्रिपुरा में ज्यादा गंभीर है क्योंकि यहाँ के मूलनिवासी खुद अपने ही प्रदेश में अल्पसंख्यक बन गए हैं। मिजोरम और अरुणाचल प्रदेश के लोगों में भी इसी भय के कारण चकमा शरणार्थियों को लेकर गुस्सा है।


Q18. “मुल्कों की शांति और समृद्धि क्षेत्रीय संगठनों को बनाने और मजबूत करने पर टिकी है।” इस कथन की पुष्टि करें।

उत्तर ⇒ प्रत्येक देश की शांति और समृद्धि क्षेत्रीय आर्थिक संगठनों के निर्माण और उन्हें सुदृढ़ बनाने पर टिकी है क्यों क्षेत्रीय आर्थिक संगठन बनने पर कृषि, उद्योग-धंधों, व्यापार, यातायात, आर्थिक संस्थाओं आदि को बढ़ावा देती है। ये आर्थिक संगठन बनेंगे तो लोगों को प्राथमिक, द्वितीयक और तृतीयक क्षेत्रों में रोजगार मिलेगा। रोजगारी गरीबी को दूर करती है
। समृद्धि का प्रतीक राष्ट्रीय आय और प्रतिव्यक्ति आय का बढ़ाना प्रमुख सूचक है। जब लोगों को रोजगार मिलेगा, गरीबी दूर होगी तो, आर्थिक विषमता कम करने के लिए साधारण लोग भी अपने-अपने आर्थिक संगठनों में आवाज उठाएंगे। श्रमिकों को उनका उचित हिस्सा, अच्छी मजबूरियों/वेतनों, भत्तों, बोनस आदि के रूप में मिलेगा तो उनकी क्रय शक्ति
बढ़ेगी। व अपने परिवार के जनों को शिक्षा, स्वास्थ्य, यातायात, संवादवहन आदि को अच्छी सुविधाएँ प्रदान करेंगे। क्षेत्रीय आर्थिक संगठन बाजार शक्तियों और देश की सरकारों की नीतयों से गहरा सबंध रखती है। हर देश अपने यहाँ कृषि, उद्योगों और व्यापार को बढ़ावा देने के लिए परस्पर जाय राज्यों (देशों) से सहयोग मांगते हैं और उन्हें पड़ोसियों को सहयोग देना होता है। वे चाहते कि उनके उद्योगों को कच्चा माल मिले वे अतिरिक्त संसाधनों का निर्यात करना चाहते हैं। ये । सभव होगा जब क्षेत्रों और राष्ट्रीय स्तर पर शांति होगी। बिना शांति के विकास नहीं हो
आर्थिक और तृतीयक व्यक्ति आया, गरीब गतिशीलता, यातायात सकता। क्षेत्रीय आर्थिक संगठन पूरा व्यय नहीं कर सकते। पूरा उत्पादन हुए बिना समटि. सकती। संक्षेप में क्षेत्रीय आर्थिक संगठन विभिन्न देशों में पूँजी निवेश, श्रम गतिशीलता सुविधाओं के विस्तार, विद्युत उत्पादन वृद्धि में सहायक होते हैं। यह सब मूल्कों की शां समृद्धि को सुदृढ़ता प्रदान करते हैं।


Q19. अन्य पिछड़े वर्गों के कल्याण के लिए सरकार ने क्या कदम उठाए हैं।

उत्तर ⇒  अनुच्छेद 340 में कहा गया है कि सरकार अन्य पिछड़ी जाति के लिए आयोग नि कर सकती है। पहली बार 1953 में काका कालेलकर की अध्यक्षता में इस प्रकार का आयोग निय किया गया। इस आयोग ने 2399 जातियों को पिछड़ी जातियों में सम्मिलित किया। 1978 में वी मंडल की अध्यक्षता में इस आयोग ने 3743 प्रजातियों को पिछड़ी जाति में
शामिल करने की सिफारिश की। कमीशन ने 27 प्रतिशत नौकरियाँ अन्य पिछड़ी जाति के लिए आरक्षित की। 1998-99 से निम्न कार्यक्रम अन्य पिछड़े वर्ग के लिए शुरू किया गया।

1. परीक्षा पूर्व कोचिंग अन्य पिछड़े वर्ग के उन लोगों के बच्चों के लिए जिनकी आय एक लाख रु. से कम हो।
2. अन्य पिछड़े वर्ग के लड़के-लड़कियों के लिए हॉस्टल।
3. प्री-मैट्रिक छात्रवृतियाँ।
4: पोस्ट-मैट्रिक छात्रवृतियाँ।
5. सामाजिक, आर्थिक तथा शैक्षणिक दशा सुधारने के लिए कार्यरत स्वैच्छिक संगठनों की सहायता करना।


Q20. भारतीय किसान यूनियन, किसानों की दुर्घटना की तरफ ध्यान आकर्षित करने वाला अग्रणी संगठन है। नब्बे के दशक में इसने किन मुद्दों को उठाया और इसे कहाँ तक सफलता मिली ?

उत्तर ⇒ भारतीय किसान यूनियन द्वारा उठाए गए मुद्द

(i) बिजली के दरों में बढ़ोतरी का विरोध किया।
(ii) 1980 के दशक के उत्तरार्ध से भारतीय अर्थव्यवस्था के उदारीकण के प्रयास हुए और इस क्रम में नगदी फसल के बाजार को संकट का सामना करना पड़ा। भारतीय किसान यूनियन ने गन्ने और गेहूँ की सरकारी खरीद मूल्य में बढ़ोतरी करने,
(iii) कृषि उत्पादों के अंतर्राज्यीय आवाजाही पर लगी पाबंदियाँ हटाने,
(iv) समुचित दर पर गारंटीशुदा बिजली आपूर्ति करना।
(v) किसानों के लिए पेंशन का प्रावधान करने की माँग की।


Class 12th Political Science Objective Question 2024

   S.NClass 12th Political Science Objective Question 2024
   1.  शीत युद्ध का दौर
   2.  दो ध्रुवीयता का अंत
   3. समकालीन विश्व में अमेरिकी वर्चस्व
   4.  सत्ता के वैकल्पिक केंद्र 
   5.  समकालीन दक्षिण एशिया
   6.  अंतरराष्ट्रीय संगठन 
   7.  समकालीन विश्व में सुरक्षा
   8.  पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधन
   9.  वैश्वीकरण
  10.   राष्ट्र निर्माण की चुनौतियां
  11.  एक दल के प्रभुत्व का दौर
  12. नियोजित विकास की राजनीति
 13.भारत के विदेशी संबंध
 14.कांग्रेस प्रणाली : चुनौतियां और पुनर्स्थापना
 15.लोकतांत्रिक व्यवस्था का संकट
 16.जन आंदोलन का उदय
 17. क्षेत्रीय आकांक्षाएं
 18.भारतीय राजनीति : नए बदलाव
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